हॉकी के जादूगर Major Dhyanchand Ki Jivani जिनके खेल के मुरीद थे सर डॉन ब्रैडमैन और हिटलर

von Gautam Kapoor

हॉकी के जादूगर Major Dhyanchand Ki Jivani जिनके खेल के मुरीद थे सर डॉन ब्रैडमैन और हिटलर
हॉकी के जादूगर Major Dhyanchand Ki Jivani जिनके खेल के मुरीद थे सर डॉन ब्रैडमैन और हिटलर
हॉकी के जादूगर Major Dhyanchand ki jivani एक ऐसे शख्स की है जिसे चांद भी अपनी रोशनी देने से पीछे नहीं हटा था।
कई साल पहले एक हरे मैदान में 17-18 साल का एक लड़का चांद की रोशनी में हॉकी खेल रहा था। उस नौजवान को देखकर लोग खूब उसका मजाक उड़ा रहे थे और उस पर हंस भी रहे थे। लोगों ने यहां तक कह दिया कि गर्लफ्रेंड से मिलकर आए हो लेकिन उस लड़के का ध्यान उनकी बातों पर नहीं था। वो तो बस बेफिक्र होकर हॉकी खेलता रहा।
लौंडे की ये लगन देखकर पास सूबेदार तिवारी काफी खुश हुए और उन्होंने कुछ बातें कहीं, "‘चांद की रोशनी में जैसे मेहनत कर रहे हो, एक दिन हॉकी का चांद बनकर चमकोगे। मैं आज से तुम्हें ध्यान सिंह नहीं ‘ध्यानचंद’ कहकर पुकारूंगा और यही से शुरू होती है,

हॉकी के उस जादूगर Ki Jivani जिसे Major Dhyanchand कहा जाता है

14 साल की उम्र में शुरू किया था हॉकी खेलना
Major Dhyanchand का जन्म 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। Major Dhyanchand के जन्मदिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
मेजर ध्यानचंद ने 14 साल की उम्र में हॉकी खेलना शुरु किया था वो तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे और तीनों ही बार भारतीय टीम हॉकी में चैंपियन बनी थी।
लांस नायक से मेजर बनने तक का सफर
साल 1927 में ध्यान चंद को लांस नायक बनाया गया। साल 1932 में लाॅस ऐंजल्स में आयोजित ओलम्पिक खेलों के समय उनको नायक बनाया गया और इसके बाद साल 1937 में सूबेदार, 1938 में वायसराय और साल 1943 में लेफ्टिनेंट बनाया गया।
वहीं, साल 1948 में कप्तान और बाद में ध्यान चंद मेजर बना दिए गए।
हिटरल भी था Major Dhyanchand के खेल का मुरीद
Major Dhyanchand के खेल के मूरीद भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में थे। यही नहीं, Major Dhyanchand की प्रतीभा के कायल तत्कालीन जर्मीन का तानाशाह रूडोल्फ हिटलर भी था।
हिटलर, Major Dhyanchand की प्रतिभा से इतना प्रभावित हुआ था कि उसने Major Dhyanchand को जर्मनी की ओर से खेलने का प्रस्ताव दे दिया था लेकिन Major Dhyanchand ने उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।

Major Dhyanchand Ki Atmakhata: खेल पर एक नजर

26 मई सन् 1928 ईस्वी में भारतीय हॉकी टीम पहली बार ओलंपिक खेलों में सम्मिलित हुई और विजय हुई।
1928 के हॉलैंड ओलंपिक के फाइनल में भारत ने हॉलैंड को 3-0 से हराया और चैंपियन बना था। खास बात ये है कि इसमें 2 गोल Major Dhyanchand ने किए थे।
वहीं, 1932 के Los Angeles में हुए ओलपिंक खेलों में भारतीय हॉकी टीम के कुल 35 गोलों में से 19 गोल मेजर Major Dhyanchand के नाम पर दर्ज है। इसके साथ ही 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत के कुल 38 गोलों में से 11 गोल Major Dhyanchand ने किए थे।
सन् 1932 में भारतीय टीम ने अमेरिकी खिलाड़ियों को एक के विरुद्ध 24 गोलो से हराया था। जिसका श्रेय भी टीम के कप्तान श्री ध्यानचंद जी को जाता है।
हॉकी के अंतरराष्ट्रीय मैचों में मेजर ध्यानचंद ने 300  से ज्यादा गोल किए हैं।
सर डॉन ब्रैडमैन भी थे Major Dhyanchand के मुरीद
Major Dhyanchand के खेल को देखते हुए, क्रिकेट के डॉन कहे जाने वाले सर डॉन ब्रैडमैन भी उनकी प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सके। उन्होंने कहा कि Major Dhyanchand ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बना रहे हों।

Major Dhyanchand Ki Jivani In Hindi: हॉकी स्टिक तक तुड़वाई गई थी

हॉलैंड में तो लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तक तुड़वा कर देखी थी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा है।जापान के लोगों का सोचना था कि उन्होंने अपनी स्टिक में गोंद लगा रखी है।
हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें बढ़ा चढ़ा कर कही गई हों लेकिन अपने ज़माने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानों कि वो कोई देवता हों।
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43 साल की उम्र में हॉकी को कहा अलविदा
हॉकी के इस दिग्गज खिलाड़ी ने 43 साल की उम्र में साल 1948 में हॉकी को अलविदा कहा था। वहीं, साल 1956 में मेजर Major Dhyanchand को पद्म भूषण से सम्मानित भी किया गया है।
उनके जन्मदिन के दिन खिलाड़ियों को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अर्जुन पुरस्कार और कोच को द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
Major Dhyanchand Ki Prapti: लगातार भारत रत्न देने की होती है मांग
हाॅकी के जादूगर Major Dhyanchand को देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न देने की लगातार मांग होती है। इसको लेकर अभी तक विवाद चल ही रहा है।
वहीं, भारतीय ओलम्पिक संघ ने मेजर ध्यान चंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित कर चुका है।

हॉकी का जादूगर अब नहीं है हमारे बीच

हॉकी का ये दिग्गज खिलाड़ी अब हमारे बीच नहीं है। 3 दिसम्बर, 1979 को Major Dhyanchand का देहांत हो गया था। उनका अंतिम संस्कार झांसी में किसी घाट पर ना करके उस मैदान पर किया गया जहां वो हॉकी खेलते थे।
Major Dhyanchand ने अपनी आत्मकथा GOAL में लिखा था कि 'आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं। अपने इसी साधारण अंदाज के लिए मेजर ध्यानचंद आज भी हिंदुस्तान के दिलों पर राज करते हैं।
आजकल जितना पसंद क्रिकेट को किया जाता है। उतना और किसी खेल को नहीं किया जाता। उनमें से एक खेल हॉकी भी है। सड़कों पर, मैदानों में सभी जगह क्रिकेट खेलते हुए आप को सब लोग मिलेंगे। परंतु हॉकी खेलता हुआ कोई नहीं दिखेगा।
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Gautam Kapoor

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